मेरे भगवान बताओ

घोरवल -सोनभद्र

अगर कोई मेरे साथ छेड़खानी व अपमान जनक इशारा करता है या अशोभनीय शब्दों का प्रयोग करता है तो हम उसका विरोध करेगें । उस समय अगर मेरे पास कोई वस्तु जैसे बाल्टी, चप्पल, मिट्टी, ब्लेड उससे उसका मुकाबला करेगें । उसके कोमल अंगो पर प्रहार करेगें । आस पास जो लोग रहेगें उन्हें भी बताएगें । उसके बाद लोगो की मदद से पुलिस में रिपोर्ट करेगें और साथ में रहने वाले लोगो की सहायता लेंगे । यदि सुनसान जगह हो तो शोर मचाकर भागने का प्रयत्न करेगें और अपने माता पिता को बताएगें ।
छेड़खानी के विरुद्ध कठोर कानून बनाने की मांग करते है । लोगो को एहसास कराने का प्रयास करेगें की सब की माँ बहन भी है

लड़की का है मान जगत में ।
मेरे भगवान बताओ
क्या लड़की इन्सान नही ।
लड़का हो पैदा जब घर में
खुशियाँ खूब मनाते है ।
महिलाए वो हर मंगल गाती
गोले दागे जाते है ।
जब वही जन्म लड़की होते हैं ।
उसका होतो क्यों सम्मान नही ।
लड़की ही थी इंद्रा गाँधी
जिसने जग में नाम किया
लड़की ही थी झाँसी की रानी
रण में जाके संग्राम किया
आज उसी लड़की का होता क्यों सम्मान नही ।
मेरे भगवान बता दो क्या लड़की इंसान नही ।

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शोषित

संगीता और रानी

कक्षा – 7
स्कूल- के.जी.बी.वी जौनपुर

चुकिं भारत एक कृषि प्रधान देश होने के साथ साथ एक पुरुष प्रधान देश भी है । अर्थात भारत में बेटी शब्द ही असुरक्षित अनचाही और असमाजिकता का प्रतीक माना जाता हैं ।
सबसे पहले तो यह जानना बहुत आवश्यक है कि बेटियाँ अनचाही क्यों है । अर्थात जो माँ स्वयं किसी की बेटी किसी की बहन और किसी की पत्नी है वह स्वयं अपनी ही बेटी को जन्म नहीं देना चाहती हैं । इस प्रकार इस दुनिया में आने से पहले ही बेटियाँ अनचाहे और सौतेलेपन का शिकार हो जाती हैं । परन्तु यदि गलती से बेटियों का जन्म भी हो जाता है तो वह इस शाषित समाज में असुरक्षा की भावना से ग्रसित रहती है ।
इसका जीता जागता उदारहण है दिल्ली गैगरेप शिकार हुई । उस दामिनी का जिसको समाज ने बेटी होने का दंड भोगना पड़ा । अतः इस पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की मलीन मानसिकता और दुविचार तुक्ष भावनाएँ और शारीरिक बलिष्टता तथा बेरोजगारी और अशिक्षा के कारण ही समाज में बेटियाँ असुरक्षित है ।
आज के इस पढ़े लिखे सभ्य समाज की अशिक्षित तुक्ष भावनाएँ ही बेटियों के विकास में बंधक बनी हुई हैं । इस समाज का बहय आडम्बर हो आकर्षक और उत्कृष्ठ है परन्तु आंतरिक रूप से यह विचारहीन और खोकला है ।
सदियों से यह समाज बेटियों से दुर्व्यहवार और दुर्विचार का प्रतीक रहा है । जिससे नारी का रूप दुर्गा, काली, शक्तिशाली तथा समाजिक न होकर अबला शोषित शक्तिहीन और असमाजिक हो जाता है
आज के समाज में महिलाओं को सबला का नाम दिया गया है परन्तु यह भावना विलुप्त हो चुकि है कि नारी तुम केवल श्रध्दा हो विश्वास रजत नग पग तल में पीयूष स्त्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में ।
बेटी का जन्म हुआ तो मातम का दिन आया रे ।
घर संसार दुखी हुआ इससे, घोर अँधेरा छाया रे ।
पर ईश्वर की प्यारी बेटी
दुनिया की नही प्यारी रे
उसके बिना कोई बात नही बनती
पर दुनिया से हारी रे
बियाह हुआ ससुराल गई जब
तोड़ दे बंधन सारे
कुछ ही दिन के बाद खबर मिली
उसको दिया जलाया रे
बेटी का जन्म हुआ तो
मातम का दिन आया रे ।

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सुझाव

किरन मिश्रा

 के.जी.बी.वी  धरमपुर जौनपुर

प्राचीन भारत में जहाँ नारियों को देवी का स्थान प्राप्त था वही भारत में 90% लोग बेटियां नही चाहते है । उनका कारण सिर्फ शिक्षा ही नही बस हमारे समाज में लडकियों को लेकर सुरक्षा भी शामिल हैं । यदि माँ अपनी बेटी को पैदा करना चाहती है तो परिवार के दबाव से वह ऐसा नही कर पाती है और उसकी गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है परिवार और समाज में बेटियों को वह स्थान नही प्राप्त है जो बेटो को दिया जाता है आज भी लगभग सभी परिवारो में बेटे और बेटी में असमानता बनी हुई है ।

दिल्ली गैग रेप घटना ने लड़कियों की सुरक्षा में एक सवाल उठा दिया गया है। आए दिन गाँव से लेकर बड़े शहरो में बच्चियों की सुरक्षा कही नही हो पा रही है । घर परिवार से लेकर सभी स्थानों पर महिलाओं की यही दशा है यदि लड़किया अपने घर में ही सुरक्षित नही है तो बाहर की कौन जिम्मेदारी लेगा।

सुझाव

कड़े कानून बनाना  चाहिए जिससे उन्हें तुरंत सजा मिले ।
सजा ऐसी हो की आगे लोगो को सबक मिले ।
लड़कियों को मानसिक रूप से सक्षम  बनाया जाए । कि वे हर  परिस्थिति के लिए तैयार रहें।
लड़कियों को जुडो, कराटे व बॉक्सिंग भी सिखाया जाए । साथ ही साथ हम माताओं को अपने बेटों को  संवेदनशील बनाएं तभी हमारा देश के लोगों में सुधर आयेगा |

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मुहतोड़ जवाब

सुजानगंज
कस्तूरबा गाँधी विद्यालय

हमे आत्मनिर्भर और अपने आप पर विश्वास होना चाहिए । अभी तक घरेलू हिंसा के कारण भारत की बेटियाँ घर से बाहर निकलने में असमर्थ थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है हम भारत की बेटियां स्वतंत्र रूप से पढ़ – लिख कर अपने पैरो पर खड़ा होना चाहती है, लेकिन अपने पैरो पर खड़े होने के लिए, हम लड़कियों को बाहर आना जाना, मतलब सड़क पर चलना पड़ता है। लड़कियों को सड़क पर चलते हुए, लड़के बोलियाँ बोलते है, लेकिन हम लड़कियों को नजर अंदाज कर देना चाहिए, अगर लड़के छेड़खानी करते है तो हम लड़कियों को मुहतोड़ जवाब देना चाहिए और डटकर सामना करना चाहिए। सबसे जरुरी बात है कि अगर लड़की का पीछा लड़का करता है तो उसे कभी भी सूनसान जगह पर नही रुकना चाहिए जहाँ पर अधिक से अधिक लोग हों वहाँ पर जाकर सभी लोगों को बता देना चाहिए और सबसे बड़ी बात है कि लड़कियों को अपने आप पर काबू रखना चाहिए क्योंकि हर माँ- बाप की यह सोच होती है कि उनकी बेटियाँ बड़ी होकर एक होनहार लड़की बनेगी। मेरी यह विनती है कि प्रार्थना हैं कि मेरे भाईयों किसी दूसरे कि बहन बेटियों को छेड़ते वक्त, अपनी बहन बेटियों को जरुर याद करें। हम लड़कियों को रात को ज्यादा देर तक घर से बाहर नही रहना चाहिए और तभी हम लड़कियां सेफ रह पाएँगी ऐसे केस न हो इसके लिए सक्त से सक्त कानून बनाना चाहिए । दिल्ली गैग रेप हुआ उसके बाद ये बहुत आवश्यक हो गया है कि हम लड़कियों को अपनी सेफ्टी के लिए कुछ ऐसा लेकर चलना चाहिए जिसे लड़कियां अपनी सुरक्षा कर सके ।

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लड़की की असमंजस

अलका

के. जी. बी . वी- जौनपुर

लड़की को शरीरिक तौर पर मजबूत बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि वह अपनी सुरक्षा स्वंय कर सके । लड़कियों को अपनी आप बीती घटनाओ को घर वालो से बताना चाहिए और छुपाना, शर्माना नही चाहिए लड़के के बहकावे में न आये घर पे शिकायत कर डरे नही ।

माँ बाप लड़कियों की शिकायत गम्भीरता से नही लेते है और उल्टा लड़कियों को गलत समझने लगते हैं जिससे लड़किया मानसिक रूप से पीड़ित हो जाती है

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पूनम का संघर्ष

किरण मिश्र
करंजाकला जौनपुर

पूनम जौनपुर की रहने वाली एक लड़की है।वो अपने माता पिता के साथ ईट भट्ठें पर काम करती है। वो पढना चाहती है लेकिन उसकी शादी की घर पर बात चल रही है।तभी उसे कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय के बारे में पता चलता है।पूनम मनो मन ही मन
विचलित हो उठी और विचार करने लगी की इस शादी को कैसे रोका जाए और स्कूल में दाखिला लिया जाये।
पूनम ने अपनी छोटी बहन के साथ बिना समय गवाएं स्कूल में नामांकन कराया और इसके इस प्रयास से घर वालो का शादी के लिए दबाव कम हुआ।
पूनम अब 8वी कक्षा की छात्रा है लेकिन अभी भी जब वो घर वापिस जाती है तो घर वाले उसपर शादी का दबाव बनाते हैं लेकिन अब वो इसका विरोध करती है और कहती है कि अभी उसे पढना है। लेकिन अब वह चिंतित है कि कक्षा 8 पढने के बाद जब वह घर जाएगी तो आगे कैसे पढ़ पायेगी और आगे की पढाई करने के लिए विद्यालय की जानकारी चाहती है।पूनम अभी आगे पढना चाहती है और शादी नहीं करना चाहती है।

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सावधानी ही सुरक्षा

समस्त बचे 
के जी बी वी-(कुत्तैन)जौनपुर

नशे पर रोक लगाना चाहिए।
शाम को लडकियों को अकेले नहीं जाना चाहिए।
गाँव में दुष्कर्म ज्यादातर शौच जाते वख्त होता है तो शौचालय घर पे होना चाहिए।
अपरचित लोगों से बातचीत नहीं करना चाहिए।
लड़कियों को बात चीत करके आत्म निर्भर होना चाहिए।
ज्यादा से ज्यादा महिला सुरक्षाकर्मी की नियुक्ती हो।
नियमित रूप से माता पिता और शिक्षको को लड़कियों से बातचीत करनी चाहिए।
पुरषों को औरतों के लिए संवेदनशील होना चाहिए।

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नारी विहीन समाज

पूनम 
के जी बी वी- (रामपुर) जौनपुर
हमारे देश में समान अधिकार नहीं है। समाज नारी विहीन होता जा रहा है। औरत लड़कियों का जन्म नहीं चाहती है और वो भूल जाती है कि वो भी एक औरत है।
औरत बिना समाज निरर्थक हो जायेगा हमें अपनी सोच बदलनी होगी और जागरूक होने की जरूरत है। बुजुर्गों में रूढ़िवादिता को बदलना होगा और जागरूक होना पड़ेगा जैसे कि लड़का लड़की समान हो सके।सरकार लड़कियों की सिक्षा को प्रेरित कर रही है और निशुल्क सिक्षा दे रही है।
दिल्ली की घटना ने दिलों दिमाग को जगझोर दिया है। यह एक अमानवीय घटना है और यह कह पाना मुश्किल हो गया है कि समाज हैवानो का है की इन्सानों का, इन हैवानो को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए और फांसी इस समस्सया का समाधान नहीं है। हमारी कानून व्यवस्था लचर है और फैसला आने में काफी समय लग जाता है जिससे आरोपी को बचने का पूरा मौका मिलता है।सही सजा का मतलब तभी है जब वो जल्द से जल्द मिले और एक बार फाँसी नहीं उन्हें उम्रकैद देनी चाहिए जैसे की वो रोज मर सके।

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हमारे देश में


रजनी रावत
कक्षा आठ, कस्तूरबा गाँधी आवासीय विघायल मलियाबाद लखनऊ

मैं तो यह जानती हूँ  कि यह अपराध जो दिल्ली में उस लड़की के  साथ हुआ वह पूरे देश में फैला हुआ है । इसके लिए सभी लड़कियों को यह आवाज उठानी चाहिए कि जो भी व्यक्ति इस प्रकार के घृणित कार्य करते है उन्हें फाँसी होनी चाहिए , लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए की किसी भी स्थिति में जो भी व्यक्ति  इस व्यक्ति इस तरह का अपराध करता है उसे निशिचत तौर से फाँसी होनी चाहिए , मेरा तो यही मानना है कि यदि ऐसा नहीं होगा तो यह निशिचत है कि ऐसी  घटनाएँ आगे भी बढती जाएगी और हमारे देश में लड़कियां सुरक्षित नहीं रह पायेंगी । लेकिन यह शर्मनाक घटना तब और भी शर्मनाक बन जाती है जब हमारा कानून व न्यायालय लम्बी अवधि तक कानूनी दाव पेंचो, सबूतों और सुनवाई में लगा रहता है तब उनकी कार्य प्रणाली पर संदेह होता है कि उनका मकसद इस अपराध की सजा तय करना है या सबूतों की माप- तौल करना ।

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मुझे इन चिरागों से डर लग रहा है

समस्त स्टाफ
कस्तूरबा गाँधी आवासीय बालिका विघालय
मडियाहूँ , जौनपुर

” मुझे इन चिरागों से डर  लग रहा है

 जला देंगे मेरा यह घर लग रहा है ,
 सड़के है रोशन घरो में अंधेरे
 मुझे  यह अजूबा शहर लग रहा है “
हम और हमारे देश के  प्रत्येक नागरिक जब तक यह मिलकर मंथन नही करेंगे तब तक महिलाओ की सुरक्षा सम्भव नही है तो बस कहना है –  मंथन करो ,मंथन करो , मंथन करो ——

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